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Saturday, 14 October 2017

जातिवाद और प्रगतिशीलता

जाति खालिस भारत  वालों का वायरस है। ऐसा वायरस जिसका कोई तोड़ कोई एंटी वायरस आजतक नहीं बना। ये वायरस पैदा होते ही हमारे शरीर में दाखिल हो जाता है हमारे दिमाग के अच्छे खासे हिस्से पर कब्ज़ा जमा लेता है। आप कितनी ही पढाई कर लो , कितनी ही कोशिश कर लो जाति नहीं जाती। बाज लोग अपनी सारी पढ़ाई जातिवाद को डिफेंड करने में ही लगा देते है। ये ज्यादा समझदार होते है। जातिवाद के खिलाफ लिखे हुए को भी जातिवाद के पक्ष में लिखने का हुनर इन्हें आता है। अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी भी एक शिक्षक और अध्येता है इन्होने एक कथित जातिवादी लोककथा को समाजवाद के ढांचे में डालने की नायब कोशिश की है।  उस कहानी में नफरत और जातिवाद कूट कूट कर भरा हुआ है।   भारत की खास बात यही रही है समय समय पर बाल गंगाधर तिलक से लेकर भारत रत्न महामना जैसे पढ़े लिखे रत्न हुए है जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी सिर्फ इस बात में लगा दी कि जातिवाद ऐसे ही फलफुलता रहे। इसलिए आजतक वो पूजे भी जाते है। अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी जी 2017 में है तो उनके तरीके थोड़े अलग है। पर बोलते वो भी रोटी को चोची ही है।  

लोक कथाएं और उनका इतिहास
 लोक कथा जैसा फैंसी  नाम देने से अमरेंद्र त्रिपाठी को लगा होगा कि उनकी कहानी को बल मिलेगा। अमरेंद्र त्रिपाठी और वेबसाइट का थिंक टैंक ने उस लोक कथा को न्यायसंगत बताने के लिए प्रेमचंद से लेकर गोरख पांडे तक सबका इस्तेमाल कर लिया। जब से प्रेमचंद और गोरख पांडे को इस बात का पता चला है दोनों डिप्रेसन में है कि उन्होंने ऐसे संवेदनहीन समाज को जगाने के लिए लिखा जिसे सोने में ज्यादा मजा आता है। खैर जातिवादी लोक कथाये और चुटकले कोई नयी बात नहीं है पूरे हिन्दू समाज में फैले हुए है। हर जाति को नीचा दिखाती कहानियाँ और चुटकले मिल जाएंगे। उनके पीछे का मनोविज्ञान भी। पर एक शिक्षक , एक अध्येता का फर्ज क्या है ? उसका फर्ज है कि उन गन्दी जातिवादी कहानियों को न्यायसंगत बताने के लिए अपनी पूरी पढ़ाई जी जान से लगा दे। अगर जातिवाद को न्यायसंगत नहीं बता पाए तो इतनी पढाई किस काम की ? क्योंकि त्रिपाठी और उनके साथ बहुत पढ़े लिखे है  उनके लिए मैं उदय प्रकाश की किताब " पीली छतरी वाली लड़की " का कुछ अंश लगा रहा हूँ
 "शालिगराम जाति से कोरी था। वह बताता था कि सवर्णो ने, और खासतौर पर ब्राह्मणो ने ऐसी कहावतें  और किस्से गढ़ रखे थे , जो कोरियो  की मूर्खता और उनकी बुद्धिहीनता को कोरी जाति का अनिवार्य सहजात चरित्र सिद्ध करने के लिए गढ़े जाते है। " 
कोई न कोई त्रिपाठी उन सब किस्सों को समाजवादी बना देगा।  कथित लोक कथा का आधार  जो सत्य नारायण की कथा अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने सुनाई उसके दो ही आधार है एक अज्ञानता , दूसरी नफरत।  जिसने भी कहानी लिखी उसने शायद अपनी ज़िन्दगी में खेत नहीं देखे होंगे। जातिवाद मेहनत नहीं माँगता। जो खेती करते है उन्हें पता है बगुला कभी ज्वार नहीं खाता। पर लिखने वाले के दो ही टारगेट थे
 एक विशेष जाति
 दूसरा मांसाहार।
  
वैसे भी ब्राह्मणो द्वारा रची अधिकतर कहानियां ऐसी ही होती है जिनका सच्चाई से दूर दूर तक लेना देना नहीं होता है। त्रिपाठी  की कहानी में बगुला जाट के खेत में ज्वार खाने जाता है। जाट उसे मारकर खा जाता है। बगुला उसके पेट में बोलता रहता है और आखिर में मल द्वार से भाग जाता है। ऐसी अद्भुत कल्पना के लिए भी अगर नोबल नहीं मिले तो दुःख होना लाजिमी है। बगुला खेत के कीड़े खाता है फसल नहीं। दूसरों के खाने से ऐसा  नफरत सवर्णो को बचपन में ही भर दी जाती है ऐसा उदारहण दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगा। संजय लीला भंसाली ने अपने फिल्म के खलनायक को क्रूर दिखाने के लिए मांस खाता दिखाया है। इस कहानी के बीच में भी मांस खाते हुए इंसान की फोटो लगाई हुई है। शाकाहार पर इस कदर गर्व  करने वाले ये भूल जाते है कि ये शाकाहार भी उन तक तभी पहुँचता है जब किसान अपना खून मिटटी में मिला देता है। पर जिस जमीन से फसले उगती है उसके बारे में भी इन शाकाहारियों को इतना ही पता है कि बगुला खेत में ज्वार खा जाता है।   क्या सिवाय अफ़सोस के कुछ किया जा सकता है।  इस कहानी के पक्ष में कई अजीज और समझदार दोस्त भी है। ये सबसे ज्यादा अफ़सोस की बात है। जुल्म , फासीवाद , अन्धविश्वास से लड़ाई करते दोस्तों को ये बेसिक सी बात समझ नहीं आती तो बाकी लोगों से क्या उम्मीद रखें। प्रेमचंद ने ठाकुर का कुआ और सद्गति में अपने समाज की क्रूर हकीकत को सबके सामने रखा था। उन्हें थोड़ी सी भी शर्म नहीं आयी इस जातिवादी कहानी को न्यायसंगत ठहराने के लिए उनका इस्तेमाल  करते हुए। कितना मुश्किल है ये समझना कि जातिवादी लिखने में और जातिवाद के खिलाफ लिखने में दोनों में जाति का नाम लिखा जाएगा पर दोनों परस्पर विरोधी बातें है । जाट एक जाति है अगर इसकी सामंती जातिवादी अहंकार को चोट पहुंचाते हुए लिखोगे , तो वो जातिवाद के खिलाफ लिखा कहा जायेगा । दूसरी तरफ इसका नाम लेकर तुम इसे मूर्ख , क्रूर साबित करती , ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देती स्टीरियो टाइप पोस्ट लिखोगे तो उसे जातिवादी पोस्ट कहा जायेगा। ज्यादा मुश्किल नही है पता लगाना थोड़ी सी संवदेनशीलता की जरूरत है । मुझे 11 वीं क्लास में  समझदार लोगों का ये कहना कि 16 दूनी आठ वाले जाट कब से कॉमर्स पढ़ने लगे एक जातिवादी कमेंट था एक 16 साल के बच्चे का मनोबल तोड़ने वाला कमेंट था । वहीं एक जाट का किसी अपने साथी को, अपने साथ काम करने वाले को जाति का नाम देकर गाली देना , उनके घर जला देना किसी की जाति के नाम को गाली की तरह इस्तेमाल करना बहुत घृणित जातिवाद का नमूना है। ये आपको देखना है आपको किस पर चोट करनी है और किसे सहलाना है आपका चरित्र उसी से तय होगा। मेरे स्टेटस में सत्येंद्र जी का कमेंट है क“ यह सामान्य बात है लेकिन जातीय दम्भ में बीमार मनोरोगियों को समझने में दिक्कत होती है।
  इस मनोरोग से हम सब पीड़ित है। इसका इलाज क्या है। एक इलाज सही शिक्षा है। दूसरा इलाज मेहनत है। मुझे लगता है बुद्धिजीवियों को भी खेत में जाकर मेहनत करनी चाहिए इससे दो फायदे होंगे।  एक तो दिमाग तंदरुस्त होगा दूसरा ये भी पता चल जाएगा कि बगुला ज्वार नहीं खाता है।  चूँकि अमरेंद्र त्रिपाठी एक शिक्षक है उन्हें देहात से और लोक कथाओ से प्यार है उनके  लिए शौक़ बहराइची का  एक शेर लिख रहा हूँ जो भारत में लोक कथाओ से भी ज्यादा फेमस है और बच्चे बच्चे की जुबान है 
 हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजाम ऐ गुलिस्ताँ क्या होगा बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक उल्लू ही काफी था ।  

Monday, 9 October 2017

मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे।


बहुत अजीब कश्मकश का दौर है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं अमोल सरोज अपने होशो हवास में फासिज्म की लड़ाई की राह में रोड़ा बनूँगा। मेरी ऐसी कोई इच्छा  भी नहीं है। ये बात भी सच है कि पूंजीवाद में रिवर्स मार्किट भी है जो चीज ट्रेंड में हो उसका  विरोध कर दो और हिट हो जाओ। नास्तिको के खुदा की कसम खा कर कहता हूँ मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है। मेरे सीए होने का जो आरोप मुझ पर लगा है वो बिलकुल बेबुनियाद है। जो मुझे  जानते है वो अच्छे से जानते है कि बतौर सीए मेरा ट्रेक रिकॉर्ड ख़ास अच्छा नहीं है और नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक मेरे विचार इतने वाहियात थे कि पिछले महीने तक सीए को पसंद नहीं आये थे। संघी होने के आरोप से उतना आहत नहीं हूँ जितना भयभीत खुद की खाकी कच्छे में फोटो इमेजिन करके हो रहा हूँ। यक। 

कल रात रिपोर्ट पर थोड़ा बहुत  लिखा था। सवाल सारे बचे हुए पार्ट पर पूछे गए। मैं फिर थोड़ा सा ज्ञान बांटने आया हूँ उससे पहले मैं ये बताना चाहता हूँ रिपोर्ट बहुत ग़ज़ब है। इससे फासिज़्म के छक्के छूट जाने है। मेरा इरादा न तो अपनी सीए की डिग्री दिखाने का है न ही ये अमित शाह से कैश लेने का। बाकी अगर ऐसा कुछ हो जाए तो मुझे हर्ज भी नहीं है। बल्कि अब तो मैं भी कुछ सीखने को आतुर हूँ। 

फिर भी मैं दिल से चाहता हूँ कि अफवाहे न फैले। अबके तो मैं कोई आरोप भी नहीं लगाऊंगा। ये वायर की रिपोर्ट का हिस्सा है। 

"इस फाइलिंग से केआईएफएस नामक लिस्टेड कंपनी से 15.78 करोड़ के असुरक्षित कर्ज का भी पता चलता है. उसी वित्तीय वर्ष के लिए, यानी जिस साल कर्ज दिया गया, केआईएफएस का राजस्व 7 करोड़ रुपये था. केआईएफएस फाइनेंशियल सर्विसेज के वार्षिक रिपोर्ट में भी टेंपल इंटरप्राइज को दिए गए 15.78 करोड़ के असुरक्षित कर्जे का कोई जिक्र नहीं मिलता है."


वायर ने लिखा कि केआईएफएस का राजस्व यानी टर्नओवर 7 करोड़ था और उसने 15.78 करोड़ का लोन दे दिया। मुझे नहीं समझ आया कि लोन के संदर्भ में टर्नओवर का जिक्र क्यों किया जबकि लोन का टर्नओवर से कोई लेना नहीं होता।  केआईएफएस के फाइनेंसिंग कम्पनी है जो अपनी कमाई से लोन नहीं देती बल्कि लोन देने से कमाई करती है। ये बिलकुल वैसे ही है कि आप मुझसे कहो कि आपके घर निम्बू का पेड़ नहीं है तो आपने अपने दोस्त को अमरुद कहाँ से दिए। भाई अमरुद के लिए अमरुद का पेड़ होना चाहिए निम्बू का हो या न हो फर्क नहीं पड़ता। 15.78 करोड़ लोन दिया या नहीं ये कम्पनी की बेलेंस शीट से  पता लग सकता है टर्नओवर से नहीं। दूसरा केआईएफएस फाइनेंशियल सर्विसेज ने वार्षिक रिपोर्ट में जिक्र नहीं किया।  मुझे लगता है  उनकी बैलेंस शीट में एसेट साइड में होगा। न होने का कोई कारण नहीं है। 


खैर ये लिखने के पीछे कारण मेरा मकसद उन 99 फीसदी लोगो की भावनाये हर्ट करना नहीं था जिन्होंने इतनी भयंकर मिसलीडिंग रिपोर्ट को बिलकुल ट्रू सेन्स में पढ़ लिया। वो फासिज्म के खिलाफ सच्चे सिपाही है मेरा मकसद सिर्फ उन एक परसेंट लोगो को जागरूक करना है जिन्हे पोस्ट पढ़कर लगा कि 80 करोड़ इनकम है। या 7 करोड़ प्रॉफिट में से 15 करोड़ लोन दे दिया। या लोन को बेलेंस शीट में नहीं दिखाया। ऐसा कुछ नहीं है। मैं चाहता हूँ कि अपनी बिरादरी खामखाह में बदनाम ना हो। मैं आपके ही साइड हूँ भले ही चेहरे पर मार्क देख लो। और बहुत मुमकिन है कि अगर अमित शाह ने कोई घोटाला किया भी हो तो ऐसी रिपोर्ट के पीछे वो छुप जाएगा। ऐसा करने से सही बात समझाना और सुनाना और मुश्किल हो जाएगा।  

मैं नोटबंदी के वक्त अपने बिरादरी के भाई लोगो को समझाने की कोशिश कर रहा था कि कैसे आपको ये सब दिखाई नहीं दे रहा है। वही कोशिश मैं अब आप सबको दिखाने की कोशिश कर रहा हूँ बहुत नॉर्मल सी बात है।  सब साफ़ दिखाई दे रहा है। आप अमित शाह के लिए कोई संजीदा कोशिश करो तो समझ आता है यही रिपोर्ट संजीदगी से बनाई जा सकती थी। पर ऐसे अफवाह फैलाने वाली स्टाइल में लिखोगे तो कैसे संजीदा हुआ  जाएगा। 


बाकी कोई दिक्कत नहीं है मैं आप लोगो के साथ ही हूँ। अपन अमित क्या ट्रम्प को भी देख लेंगे सब पूंजीपति एक जैसे है। फासीवाद के खिलाफ हर तरह की जंग सही है। इस बार माफ़ कर दो तो अगली बार शिकायत का मौका नहीं दूंगा 

Sunday, 8 October 2017

आंकड़ों का जादुई खेल


खबरें एक बहुत बड़ा बाजार है। ये तब और बड़ा हो गया है जब सबको अपने मतलब की खबरें चाहिए होती है। ख़बरों का एक मतलब होता है और एक मतलब की खबरे होती है। यानी हमने पहले से तय कर लिया है हमें कौन सा सच सुनना है या कौन सा पक्ष सुनना है। पूंजीवाद ने हमें ये सुविधा भी दे ही दी है कि हम जो अपने पसंद का सच सुन सकते है। अख़बार के लिए मार्क ट्वेन का एक कोट है कि अगर आप अख़बार नहीं पढ़ते तो आप बेखबर हो अनभिज्ञ हो और यदि अख़बार पढ़ते हो तो ग़लत जानकारी के मालिक हो जाते हो।
 

खैर आज एक क्रन्तिकारी रिपोर्ट वायर ने जारी की जिसने लोकप्रियता के सभी आयाम तोड़ दिए। सभी प्रगतिशील दोस्तों ने वो रिपोर्ट को शेयर किया। खबर का शीर्षक था
जय अमित शाह का जादुई या सुनहरा स्पर्श।
मैंने वो रिपोर्ट पढ़ी तो लगा कि अपनी थोड़ी बहुत जानकारी रिपोर्ट की लेखिका को और रिपोर्ट को शेयर करने वाले दोस्तों को दे दी जानी चाहिए। बड़े बुजुर्ग कह गए है ज्ञान बांटने से बढ़ता है। वैसे भी पत्रकारों को तकनीकी ज्ञान कम होता है ये ज्ञान तब और भी कम हो जाता है जब खबर अपने मतलब की हो। 

सबसे पहले मैं तुलना करने के आधारभूत  सिद्धांत के बारे में आप सब को बताना चाहूँगा। तुलना ,जिसे अंग्रेजी में कम्पेरिजन कहा जाता है का कोई आधार होता है। तुलना हमेशा समान आधार वाली चीजों की ही होती है। आप बेर और तरबूज की तुलना नहीं कर सकते। उस रिपोर्ट की पहले पैराग्राफ में जो गड़बड़झाला है वो ये है कि आपने तीन सालों का प्रॉफिट दिखाकर चौथे साल का टर्नओवर दिखा दिया। अब प्रॉफिट और टर्नओवर में क्या फर्क है वही जो बेर और तरबूज में है। जिनको टर्नओवर का मतलब नहीं पता उन्हें बता देता हूँ टर्नओवर का मतलब बॉल टर्न कराने वाले स्पिनर का ओवर नहीं होता है। टर्नओवर का मतलब साल की कुल बिक्री होता है । उस बिक्री में से सारे साल के खर्चे निकाल कर जो बचता है उसे प्रॉफिट कहते है यानी लाभ। लेखिका ने एक जगह टर्नओवर शब्द का इस्तेमाल किया है नीचे रेवेन्यू शब्द का इस्तेमाल किया है दोनों का मतलब कुल बिक्री ही होता है। लेखिका मासूम है और दोस्त तकनीक के जानकार नहीं है। जाने कितने दोस्तों ने टर्नओवर को जय शाह की इनकम बताया। खैर ऐसा नहीं करना चाहिए। लेखिका को तुलना करनी थी तो चौथे साल का प्रॉफिट या लॉस दिखाना था ऐसा बिलकुल सम्भव है 80 करोड़ की बिक्री में 2 करोड़ का लॉस निकल आये। 

फिर रेवेन्यू को आधार बनाकर 16000  गुना बढ़ोतरी बताई गयी जो बिलकुल सही है। पहले साल 50000 की सेल थी जो अगले साल 80 करोड़ की हो गयी यानी 16000 गुना।  लेखिका का 16000 गुना से पेट नहीं भरा तो बाद में उसे 16 लाख  परसेंट बढ़ोतरी  बता दिया जो भी ग़लत नहीं है। दो  गुना का मतलब दो सौ परसेंट होता है। एक चीज को अलग अलग तरह बताने से शायद इम्पेक्ट ज्यादा  पड़ता हो। 

फिर किसी दूर के रिश्ते से 15 करोड़ का लोन दिखा दिया। जो बिजनेस करते है वो जानते है कि ना तो 80 करोड़ का टर्नओवर कोई ऐसी बड़ी बात है न 15 करोड़ का लोन। हर कम्पनी के फाइनल अकाउंट्स का ऑडिट होता है उसके बाद वो roc में फाइल होते है।  अब अमित शाह बीजेपी पार्टी से है तो उनके सब दोस्त भी उसी पार्टी में होंगे। जिससे उधार लेंगे वो भी नॉर्मली दोस्त ही होंगे। 

पूरी रिपोर्ट ही ऐसे आंकड़े इकट्ठी कर के बनाई हुई है कि जिसमे निकलना कुछ नहीं है फजीहत होनी है वो अलग से। ऐसी खबरों पर जान निसार करते क्रांतिकारियों को देख कर अम्बानी अडानी शायद हँसते ही होंगे। 

आप सब काबिल लोग हो फिर भी ये बताना मेरा फर्ज बनता है कि टर्नओवर इनकम नहीं होती है। ये बताना भी मेरा फर्ज बनता है कि इस तरह की घटनाये विश्वनीयता  कम करती है और ये सोचने पर मजबूर करती है कि फेसबुक पर हम सब अपना दिल बहलाने के लिए ही है। वायर हो या उस पोस्ट को शेयर करने वाले दोस्त उनको एक बार जरूर सोचना चाहिए कि तर्क के नाम पर हम क्या शेयर कर रहे है या यही तर्क यही आंकड़े जब हमारे किसी प्रिय के खिलाफ इस्तेमाल होंगे तो हमारे तर्क क्या होंगे। आज कल जो कुछ भी हो रहा है हमें आकंड़ो का ऐसा खेल खेलने की जरूरत क्या है जिसमे हम ही फंस जाए। खबर में जिस कदर बातों को छुपाया गया है और जो बताने की कोशिश की गयी है उससे अमित शाह की छवि एक बेहद ईमानदार नेता की निकलती है जो इतने साल गुजरात में मंत्री रहने के बावजूद भी अपने बेटे की कम्पनी नहीं चलवा सका और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कम्पनी की बिक्री केवल 80 करोड़ तक ही पहुंचा पाया। ये तो ईमानदारी की हद ही हो गयी। पर ऐसा नहीं है। हकीकत इससे बहुत अलग है। 80 करोड़ के टर्नओवर और फिर सौ  करोड़ की मानहानि के खबर से अगर फायदा किसी को हुआ है तो वो या तो वायर को हुआ है या फिर जय शाह को। कल तक उनका नाम नहीं जानते थे आज सब जानते है। इतनी पब्लिसिटी के लिए बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है यहाँ बिना पैसे दिए ही काम हो गया। खैर लिखने को बहुत कुछ है पर अभी ज्यादा लिखना फासिज्म की लड़ाई को कमजोर करेगा। मेरे इतने लिखने से फासिज्म की लड़ाई में जो नुकसान हुआ है उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ। बहरहाल परसाई जी का लिखा हुआ  छोड़े जा रहा हूँ। शुभ रात्रि 




इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं.

Tuesday, 3 October 2017

ये दुनिया एक पागल खाना है



आजकल हर जगह मानसिक रोग छाया हुआ है एक पत्रकार ने दूसरे सीनियर पत्रकार को बाकायदा पत्र लिख कर बीमार कहा। बीमारी के लक्षण भी बताये। इलाज करवाने के लिए भी कहा। ऐसे भले लोग कहाँ मिलते है आजकल जमाने में। डॉक्टर को दिखाने की फीस भी बचा ली। उन्होंने ही बता दिया बीमार हैं। अभी उनका खत पढ़ ही रहा था कि दो तीन जवाबी खत भी आ गए कि सीनियर पत्रकार को बीमार लिखने वाला पत्रकार खुद बीमार है उन्होंने भी बाक़ायदा लक्षण बताये। फेसबुक ने इतने मनोवैज्ञानिक पैदा कर दिए है कि अब मनोविज्ञान को विषय अब हटा देना चाहिए। अब बाकी सब बीमारी दूर हो चुकी है अब सिर्फ एक ही बीमारी बची है कि सब लोग अपने को डॉक्टर समझने लगे है। ये ज्यादा बुरी बीमारी नहीं है। बहुत से लोग अपने को अमिताभ बच्चन समझते है। कितने लोग अपने को हिटलर समझते है। अब इससे तो अच्छा है कि खुद को डॉक्टर ही समझ लिया जाए। समझने में कोई दिक्कत नहीं है बस प्रेक्टिस शुरू ना कर दे।  खैर मुझे एक चुटकुला याद आ रहा है। एक आदमी मॉर्निंग वाक् पर निकले तो पार्क की एक दीवार पर लिखा देखा 

" पढ़ने वाला पागल है "

सुबह सुबह दिमाग ख़राब हो गया। साहब को बड़ा गुस्सा आया। भागकर घर से मार्कर लेकर आया और उस दीवार पर नीचे लिख दिया 

" लिखने वाला पागल है। "

पागलपन पर चुटकुलों का तो कोई अंत नहीं है। एक और मशहूर चुटकुला है। एक पागल अपने डॉक्टर को कहता है कि कल मैंने ताजमहल को खरीद लिया। इतने में दूसरा पागल कहता है कि ये झूठ बोल रहा है ये ताजमहल खरीद ही नहीं सकता। डॉक्टर को दूसरे मरीज से थोड़ी उम्मीद बंधती है। उससे पूछता है कि क्यों नहीं खरीद सकता ये ताजमहल ? तो दूसरा पागल जवाब देता है कि मैं बेचूँगा ही नहीं तो खरीदेगा कैसे। हम सब का यही हाल है। ताजमहल से याद आया कि ताजमहल को टूरिस्ट स्पॉट से हटा दिया उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी ने। मुख्यमंत्रियों को ये काम शोभा देते है। वैसे भी आगरा पागलखाने के लिए मशहूर रहा है। अभी बात पागलपन पर ही रहने देते है। मंत्रियो की बात चली तो पागलखाने से कही आगे पहुँच जायेगी। हरियाणा के मुख्यमंत्री सरस्वती को ढूंढ़ने पर उतारू हैं जो कहीं नहीं है। यूपी के मुख्यमंत्री पूरी दुनिया में पर्यटन के लिए मशहूर ताज महल को मिटाने के मिशन पर है। सही है जो नहीं है उसको बताओ है जो है उसको बताओ नहीं है। अगर ये लोग मुख्यमंत्री न होते तो कोई डॉक्टर इन्हे पागल बता सकता था पर पागलपन के मानक मंत्रीयों के लिए दूसरे होते है , पत्रकारों के लिए दूसरे , अपने लिए दूसरे , दुसरो के लिए दूसरे 



 मोटा मोटी बात जो मुझको समझ आयी है वो ये  है कि हम जिस लेवल के पागल है सभ्य लोग उसी लेवल पे पाये जाते है। हमारे लेवल का पागलपन ही सभ्यता कहलाती है। हमारे से ऊपर के लेवल के पागल अंधविश्वासी , ढोंगी और मुर्ख है और हमारे से नीचे लेवल के पागल 'पेसिमिस्टिक', दुसरो की खुशी न बर्दाश्त करने वाले मानसिक रूप से बीमार ,अति वादी है। जो तर्क हम अपने से ऊपर के पागलो पर लगाते हैं वो तर्क हमारे से नीचे के पागलो को हम पर लगाने का अधिकार नहीं है। एक दोस्त के पास दस लाख रूपये वाली गाडी थी। वो उससे नीचे वाली गाड़ियों के लिए कहता था इनसे अच्छा तो गाडी ना ही खरीदो। और अपने वाली गाडी से महँगी वाली गाड़ियों के लिए कहता था कि इतनी महंगी गाडी खरीदने का क्या फायदा  ? पहिये तो इनके भी चार है। चलना तो इन्हे भी सड़क पर ही है। हरियाणा में एक कहावत है अपना पाद सबको स्वाद लगता है। हालाँकि पाद कोई खाने की चीज नहीं है पर कहावत हरियाणा की है तो अच्छी है क्यूंकि मैं हरियाणा में पैदा हुआ हूँ। शिव जी के लिंग की पूजा करने वाले राम रहीम को  पूजने वाले को पागल कहते हैं। राम रहीम वाले निर्मल बाबा वालों  को पागल कहते हैं। अभी दिवाली आने वाली है। फसल की पराली जलाने के लिए किसानो को कोसने वाले लोग  गाडी भर भर पटाके जलाएंगें। सांस लेना मुश्किल हो जाएगा।  आतिशबाजी के पक्ष में (कु)तर्क दिया जाएगा  कि आतिशबाजी तो सारे संसार में होती है। उनके लिए आप कुछ नहीं बोलते। 'पहले उस आदमी के साइन लेके आओ ' की तर्ज पे दिए कुतर्को का क्या कोई जवाब दिया जा सकता है? (वैसे सलीम जावेद के इस डायलॉग ने हमारी मुश्किलो में जितना इज़ाफ़ा किया है उसके लिए मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं करूँगा। हम तो निरुपमा रॉय की तरह ये भी नहीं कह सकते कि बाकी जो आतिश बाजी कर रहे है वो मेरे कौन है?) क्या सारे संसार में जो हो रहा है उसे मानक मानकर अपनी बेवकूफियों को , गलतियों को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है ? संसार में तो हिंसा भी बड़े चाव से देखी जा रही है। मरियल से मरियल आदमी भी सपने में दस को मार के सोता है। तो क्या हिंसा को सही मान लिया जाए ? संसार में तो और भी बहुत कुछ हो रहा है। मजदूरो , गरीबो का जबरदस्त शोषण हो रहा है तो क्या बेगार को फिर से मान्यता दे दी जाए? हम पीछे से आगे जाए या आगे से पीछे ? असभ्य तरीके से आतिशबाजी , लाउड स्पीकर पे बेसुरे माता के भजन को श्रद्धा ख़ुशी बता रहे हो पर इसके पीछे कोई तर्क तो है नहीं तो श्रद्धा का नाम दे दिया। दरअसल श्रद्धा और हिंसा तर्क से दूर भागने का ही नाम है।  खैर मुझे गर्व तो नहीं पर ख़ुशी जरूर है कि मैं एक लेवल नीचे का पागल हूँ और सुधरने के रस्ते खुले रखे हुए है। आप से हमदर्दी भी है क्यूंकि जहां आप आज हो कल मैं भी वहीँ था। और आज इन्तजार कर रहा हूँ आपके आने का मेरे पास ताकि हम मिलकर और आगे जा सके

Thursday, 28 September 2017

लड़कियों की आजादी से बड़ा देशद्रोह दूसरा नहीं है



काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के त्रिपाठी का कहना है कि वो बी.एच.यू को जे.एन.यू नहीं बनने देंगे। मुझे जे.एन.यू याद आ गयी। जे.एन.यू  में कुल मिलाकर 5-6 बार जाना हुआ है। हर बार यही लगता है कि भारत में कहीं जन्नत है तो यही है। बी.एच.यू में लड़कियों की छेड़छाड़ की शिकायत की जाती है तो जवाब आता है कि कैम्पस से राष्ट्रवाद ख़त्म नहीं होने दिया जाएगा। जे.एन.यू को राष्ट्रद्रोही यूनिवर्सिटी का तमगा मिला हुआ है। मुझे जे.एन.यू कैंपस में बिताई मेरी पिछली रात याद आ रही है। अगर दोनों यूनिवर्सिटी की लड़कियों की आजादी के सन्दर्भ में राष्ट्रवाद को परिभाषित किया जाए तो शायद महिला उत्पीड़न और महिला ग़ुलामी को ही राष्ट्रवाद कहा जाएगा। बी.एच.यू नहीं गया कभी पर जे.एन.यू की जो भी संक्षिप्त सी यादें है उन में से आखिरी वाली सबसे बेहतरीन है। 
शायद एक दो महीने पहले की बात है। मैंने और वर्षा ने जे.एन.यू घूम के आने का प्लान किया। वर्षा और मुझे में जो कुछ कॉमन है वो ये है कि हम दोनों हिसार से सम्बन्ध रखते हैं। वर्षा से पहली मुलाकात 8-9 साल पहले हुई थी  मैंने तब लिखना शुरू ही किया था नयी नयी फेसबुक मिली थी  वर्षा शायद पहले से लिखती थी। दोनों के लिखने में फेसबुक का बहुत बड़ा हाथ रहा। इन सात आठ सालों में हम शायद 7-8 बार भी नहीं मिले। जब वर्षा हिसार रहती थी तो मैं गुड़गांव रहता था मैं हिसार आया तो वर्षा दिल्ली में कविता , नज़्म लिखने लग गयी। ये सब बताना इसलिए जरुरी है कि जिसको पता न हो उसे दो बातों का पता लग जाए एक कि मैं भी लिखता हूँ दूसरा सिर्फ लिखता ही नहीं हूँ वर्षा का दोस्त भी हूँ जो दिल्ली में आये दिन किसी न किसी प्रोग्राम में हिस्सा लेती रहती है। बड़े बड़े कार्टूनिस्ट जिनसे हम मिलने की तमन्ना रखते है वो वर्षा के दोस्त हैं। हम  दोनों के ही घर परिवार या आसपास के वातावरण में कुछ लिखने या सोचने के अनुकूल माहौल नहीं था। हरियाणा में कोर्स की किताबों के अलावा और कुछ पढ़ना बेवकूफी माना जाता है। कोर्स की किताब पढ़ना भी यहाँ बहुत से लोग बेवकूफी ही मानते हैं। हरियाणा की तारीफ फिर कभी करेंगे। अभी तारीफ सिर्फ जे.एन.यू की करनी है। 
हम दोनों शाम 6 बजे क्नॉट प्लेस से जे.एन.यू की तरफ रवाना हुए। वर्षा जे.एन.यू में बहुत लोगों को जानती थी जिसमें से एक मशहूर कार्टूनिस्ट गोपाल शून्य जी भी है, जिनसे मिलना मेरे वहाँ जाने का एक मकसद था। मैं वहाँ सिर्फ ऋतु  को जानता था। उससे से भी मुलाक़ात फेसबुक के जरिये ही हुए थी। बाद में पता लगा वो भी हिसार के एक गांव की रहने वाली है। उसे देख कर मुझे मेरी छोटी बहन याद आ जाती है हर बार। वो जिस तरह से मुझे भाई कहकर बुलाती है, वो लहजा मेरी बहन से काफी मिलता है। अब बात लड़कियों की ही है तो थोड़ी तारीफ ऋतु की भी कर ली जाए। ऋतु अभी हाल ही में लंदन जाकर आयी है एक सेमीनार में। जेएनयू में पी.एच.डी कर रही है। साथ ही दिल्ली युनिवर्सिटी के कालेज  में बच्चों को  पढ़ा भी रही है। हरियाणा में लड़कियों की हालत किसी से छुपी हुई नहीं है। हरियाणा के समाज की संकीर्णता को लात मारकर इतनी आगे तक जाना बहुत काबिले तारीफ है। पर ये काबिले तारीफ किसके लिए है ? कम से कम त्रिपाठी जैसे लोगों के लिए तो नहीं जो लड़कियों को शाम 6 बजे पिंजरे में बंद कर देना चाहते है जो लाइब्रेरी बंद कर देना चाहते है। उनका ये डर ही बताता है कि लड़कियों की योग्यताओं से हिन्दू शेर किस कदर भयभीत है। 
हिन्दू शेरों की बात भी फिर कभी। मैं जितनी बार  जे.एन.यू गया, मेरे अंदर आने का गेट पास ऋतु ही थी। उसका ये उलाहना हर बार रहता था कि मैं जेएनयू के एंट्री गेट पर उसे याद करता हूँ। जेएनयू के अंदर आने के बाद ढंग से मिलता भी नहीं। हर बार ऐसा ही हुआ। इस बार मैं ठान के आया था कि उससे जी भर के बात करनी है। हम जेएनयू साढ़े सात बजे के आसपास पहुँचे। सबसे पहले गोपाल शून्य से मिले। कमाल के कार्टूनिस्ट है। देश के हुकुमरान पर जिस तरह का तीखा व्यंग्य वो अपने कार्टून में उतारते है वो बस देखते ही बनता है  फिर धीरे धीरे उनके दस पन्द्रह दोस्तों का जमावड़ा हो गया। अब जे.एन.यू का वातावरण वैसा तो नहीं रहा था, जैसा उस रात था जब मैं पहली बार योगेश के साथ आया था। पर फिर भी जे.एन.यू के अंदर जाकर ऐसा लगता है मानो सच में आजाद हवा में साँस ले रहे हो। हम सब एक जगह बैठकर बात करने लगे। सबका आपस में परिचय हुआ। सब अलग अलग जगह से थे। बात बातों में दस बजे गए। मैं और ऋतु पानी पीने के लिए उनसे अलग हुए तो जेएनयू की  पहाड़ियों पर बैठकर गप्पे मारने का तय हुआ। रात के दस साढ़े दस बजे जेएनयू में सब  लड़के लड़कियाँ इतनी आराम से घूम रहे थे  कहीं कोई दिक्कत नहीं थी। ऋतु पूरी जेएनयू दिखाते हुए मुझे जेएनयू की फेमस पहाड़ियों तक ले आयी। वहाँ भी किसी तरह की कोई पाबन्दी नहीं थी। थोड़ी चढ़ाई के बाद जिस पहाड़ी के पत्थर पर हमने बैठने  का प्लान किया, उसी के पास अगले पत्थर पर दो लड़के और एक लड़की पहले से बैठे हुए थे और राजनीति पर डिस्कस कर रहे थे। ये है वो जेएनयू का कल्चर जिसे अपने प्रांगण में दाखिल  न होने देने की कसम कुलपति त्रिपाठी खाये हुए है। बताओ  रात में दो लड़के एक लड़की बैठकर पोलटिक्स पर डिस्कस कर रहे है। हद नहीं है। भारतीय संस्कृति में तो भाई बहन को भी अकेले में साथ बैठने की मनाही है। यहाँ लड़के का फर्ज है कि लड़की की जींस में हाथ डालकर भाग जाए और लड़की शाम 5 बजे पिंजरे में बंद हो जाए। ऐसे मूल्यों की रक्षा करने वाले कुलपति बी.एच.यू को जे.एन.यू कैसे बनने दे सकते हैं। वहाँ बैठकर हमने एक डेढ़ घंटा बात की। ऋतु ने अपनी पढाई की, अपने  स्ट्रगल की बात बताई। कैसे बावजूद हर क्लास में टॉप करने के , ऋतु को पोस्ट ग्रेजुएशन में डिस्टेंस में दाखिला लेना पड़ा और कैसे हर क्लास की टॉपर को महान कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी ने फेल डिक्लेयर कर दिया। ऐसे काम यहाँ होते रहते है। एक बार की बात बताता हूँ। मेरे पांच काबिल दोस्तों का पोस्ट ग्रेजुएट के एक विषय का पेपर था। उन पांचों में सिर्फ एक दोस्त उस पेपर में पास हुआ और विडंबना ये कि सिर्फ एक उसी दोस्त ने वो पेपर नहीं दिया था। रिजल्ट आने के बाद बाकी दोस्तों को भी अफ़सोस हुआ कि काश वो भी पेपर नहीं देते। खैर डिस्टेंस पोस्ट ग्रेजुएट के पहले साल में फेल घोषित होने के बाद ऋतु ने जामिया मिलिया युनिवर्सिटी में एंट्रेंस पास किया।  जामिया मिलिया के एंट्रेंस की तैयारी के वक्त ऋतु जेनयू में रही जहाँ उसे पढ़ने का, आगे बढ़ने का माहौल मिला और उसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज ऋतु ने दो विषय में नेट JRF उत्तीर्ण किया हुआ है अभी लंदन जाकर सेमिनार में पेपर प्रैजेण्ट करके आयी है और नवम्बर में स्पेन जा रही है। 
साढ़े बारह बजे हल्की हल्की बारिश शुरू होने लगी तो हम पहाड़ियों से वापिस आ गए। वहाँ से चाय की तलाश में जेएनयू की लाइब्रेरी आ गए। किसी भी तरह का कोई डर कोई फ़िक्र कुछ नहीं। चाय तक पहुंचे तो बारिश तेज शुरू हो चुकी थी हमसे आगे चार पांच लड़कियां चाय के लिए लाइन में लगी थी। चाय पीकर लाइब्रेरी पहुंचे तो  देखा वहाँ सब पढ़ रहे थे। एक बजे से ऊपर का वक्त था और विद्यार्थी चुपचाप लाइब्रेरी में पढ़ रहे थे। ऋतु ने बताया कि यहाँ सारी रात पढ़ते रहते हैं। एक डेढ़ साल पहले तक रात में खाना खाने की कोई दिक्कत नहीं होती थी पर अब रात को खाना नहीं मिलता। अगर आपको भूख लगी है तो सुबह का इन्तज़ार करने के सिवाय कोई ऑप्शन  नहीं है। बीएचयू भले ही जेनएयू न बन पाए पर जेएनयू को बीएचयू बनाने की पुरजोर कोशिशें है। एम फ़िल्, पी.एच.डी. की सीट 90 फीसदी तक कम कर दी गयी हैं। ऋतु के सब्जेक्ट में सीटें 60 से घटा कर 1 कर दी गयी है। जिन ऋतुओं को भूले भटके पढ़ने का मौका मिल गया है, अब पूरी कोशिश है कि आगे ऐसा नहीं होने दिया जाए। 
दो  बजे वर्षा का फोन आया वो सब किसी हॉस्टल में जा रहे थे सोने के लिए। जबकि हमें जेएनयू घूमने में ज्यादा मजे आ रहे थे। उसके बाद हमने एक हॉस्टल में कैरम बोर्ड खेला। सुबह चार बजे मैं जेएनयू से रवाना हुआ।  लोग मॉर्निंग वाक् के लिए आ रहे थे। 
ये है जेएनयू का कल्चर जिससे सारे देश के अनपढ़ खफा है। क्यों खफा है ? क्यूंकि यहाँ उन फूलों को खिलने का मौका मिलता है जिन्हे बाहर बेरहमी से पैरों के नीचे कुचल दिया जाता है। बीएचयू में लड़कियों ने जो किया वो शायद भारतीय शिक्षा के ठेकेदारों की उम्मीद के परे था पर अब इन्हें रोकना मुमकिन नहीं है। 
वर्षा के लिखने में , ऋतु की सफलता को जेएनयू से उनके सबंध से नहीं जोड़ा जा सकता। पर जे.एन.यू ऐसी जगह जरूर है जहाँ आकर लड़कियाँ आजादी की सांस ले सकती है। अपने पंख फैला सकती है। कौन भाई ऐसा नहीं चाहेगा कि उनकी बहनों को ऐसा कल्चर मिले ऐसी जगह मिले जहाँ उनको साँस लेने की आजादी हो।  खुले आसमान में उड़ने की आजादी हो। जेएनयू में भी कोई एलियन नहीं रहते है। वही लोग है पर वहाँ का कल्चर ऐसा बनाया है जो सबको लोकतान्त्रिक मूल्यों के साथ जीने की आजादी देता है। ऐसा कब तक रहेगा ये कहना मुश्किल है पर अब तक भारत में लड़कियों के लिए जेएनयू सबसे बेहतरीन शिक्षा संस्थान है